दिल्ली SIR पर सुप्रीम कोर्ट की चुनाव आयोग को नसीहत, कहा- लोगों पर बोझ डालने के बजाय उनके पास जाइए

Delhi Voter List SIR: दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को अहम निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची में नाम हटाने के लिए ‘तार्किक विसंगति’ को आधार बनाने की वैधता पर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है। साथ ही, कोर्ट ने दावा और आपत्ति दर्ज कराने की समयसीमा बढ़ाने तथा फॉर्म 6 और 8 से जुड़ी प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए।
‘लोगों के पास खुद पहुंचे चुनाव आयोग’
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि दिल्ली जैसे बड़े शहर में लोग रोजगार और कामकाज के लिए लगातार अपने पते बदलते रहते हैं। ऐसे में यह मानकर नहीं चला जा सकता कि मतदाता अपने पुराने पते पर ही रह रहा होगा।
CJI सूर्यकांत ने चुनाव आयोग से कहा कि लोगों पर कार्यालय आने का बोझ डालने के बजाय आयोग को खुद उनके पास पहुंचना चाहिए। सुनवाई के दौरान आयोग की ओर से दलील दी गई कि पता बदलने पर मतदाता को इसकी जानकारी देनी होती है, ताकि रिकॉर्ड में संशोधन किया जा सके।
‘तार्किक विसंगति’ पर अभी अंतिम फैसला नहीं
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने स्पष्ट किया कि बिहार में SIR की वैधता को बरकरार रखने के फैसले में ‘तार्किक विसंगति’ का मुद्दा शामिल नहीं था। उन्होंने कहा कि इस आधार पर नाम हटाने की कानूनी वैधता पर अभी अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।
चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर में छह से अधिक भाई-बहन होने, नाम की वर्तनी में अंतर और माता-पिता की उम्र से जुड़े अंतर जैसे मामलों को विसंगति के रूप में चिह्नित किया गया है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि ऐसी तकनीकी विसंगतियों के आधार पर पहले से मतदाता रहे लोगों को दोबारा फॉर्म-6 भरने के लिए बाध्य करना कितना उचित है।
फॉर्म-6 और फॉर्म-8 पर भी उठे सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग निर्धारित फॉर्म की प्रक्रिया में मनमाने बदलाव नहीं कर सकता। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि वर्ष 2003 की मतदाता सूची में सत्यापित नामों को इतने वर्षों बाद तार्किक विसंगति के आधार पर दोबारा जांच के दायरे में कैसे लाया जा सकता है।
कोर्ट ने दिल्ली के भीतर पता बदलने वाले मतदाताओं को फॉर्म-8 के जरिए संशोधन का अवसर देने पर भी जोर दिया। अदालत ने कहा कि प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए, जिससे वैध मतदाताओं को अनावश्यक परेशानी न हो और उनके नाम मतदाता सूची से न कटें।
समयसीमा बढ़ाने पर विचार, दो सप्ताह बाद अगली सुनवाई
सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की ओर से दावा और आपत्ति फॉर्म जमा करने की 30 अक्टूबर की समयसीमा बढ़ाने का मौखिक आश्वासन दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीद जताई कि आयोग जनहित को ध्यान में रखते हुए समयसीमा बढ़ाने और प्रक्रिया को सुचारु बनाने के लिए कदम उठाएगा।
मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी। अदालत ने संकेत दिया कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण में यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि तकनीकी विसंगतियों के कारण किसी भी पात्र मतदाता का अधिकार प्रभावित न हो।



