अमेरिका-ईरान तनाव में नया मोड़! 2018 की न्यूक्लियर डील से बाहर निकलने का फैसला अब ट्रंप पर भारी


वॉशिंगटन/तेहरान। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच साल 2018 का एक पुराना फैसला फिर से सुर्खियों में आ गया है। अमेरिका ने आठ साल पहले जिस न्यूक्लियर समझौते जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (JCPOA) से खुद को अलग किया था, वही अब 2026 में बड़ी रणनीतिक चुनौती बनता नजर आ रहा है।
तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल (2017-2021) के दौरान इस डील को कमजोर बताते हुए इससे बाहर निकलने का फैसला लिया था। ट्रंप का कहना था कि यह समझौता अमेरिका के हित में नहीं है और इससे ईरान को अनुचित लाभ मिल रहा है।
हालांकि अमेरिका के समझौते से बाहर होने के बाद हालात तेजी से बदल गए। ईरान ने धीरे-धीरे उन प्रतिबंधों और सीमाओं को तोड़ना शुरू कर दिया, जो उसके परमाणु कार्यक्रम को नियंत्रित करती थीं। इसके बाद ईरान ने यूरेनियम संवर्धन समेत कई गतिविधियों को बढ़ा दिया।
अब जब ट्रंप दोबारा ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को काबू में लाने की कोशिश कर रहे हैं, तो उन्हें पहले से कहीं ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि 2018 का फैसला आज अमेरिका की कूटनीतिक स्थिति को कमजोर कर रहा है और पश्चिम एशिया में तनाव को बढ़ा रहा है।
क्या थी JCPOA डील?
साल 2015 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में अमेरिका, ईरान और विश्व शक्तियों के बीच Joint Comprehensive Plan of Action (JCPOA) पर समझौता हुआ था। इसके तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर सख्त सीमाएं स्वीकार की थीं।
समझौते के अनुसार ईरान ने लगभग 97 फीसदी समृद्ध यूरेनियम भंडार कम किया था और अपने कार्यक्रम को तय दायरे में रखने पर सहमति दी थी। उस समय माना गया था कि इससे ईरान के परमाणु हथियार विकसित करने का खतरा काफी हद तक कम हो जाएगा।
फिर क्यों बढ़ा संकट?
2018 में अमेरिका के समझौते से हटने के बाद ईरान ने भी कई प्रतिबद्धताओं का पालन कम कर दिया। अब क्षेत्रीय तनाव, प्रतिबंधों और सैन्य गतिविधियों के बीच यह मुद्दा फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में आ गया है।



