125वीं जयंती पर पीएम मोदी ने किया डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को नमन, युवाओं से किया विकसित भारत का आह्वान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जन्म जयंती के अवसर पर एक विशेष लेख लिखते हुए उन्हें राष्ट्रवाद, त्याग, सेवा और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतीक बताया है। उन्होंने कहा कि 6 जुलाई का दिन उन करोड़ों भारतीयों के लिए विशेष महत्व रखता है जो राष्ट्र प्रथम की भावना में विश्वास रखते हैं।
प्रधानमंत्री ने अपने लेख में कहा कि डॉ. मुखर्जी का पूरा जीवन भारत की एकता, अखंडता और राष्ट्रीय स्वाभिमान के लिए समर्पित रहा। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों और व्यक्तिगत दुखों के बावजूद राष्ट्रसेवा का मार्ग नहीं छोड़ा और अपने संकल्प को हमेशा सर्वोपरि रखा।
जम्मू-कश्मीर और राष्ट्रीय एकता का उल्लेख
पीएम मोदी ने लिखा कि देश के विभाजन के दौरान पश्चिम बंगाल को भारत का अभिन्न हिस्सा बनाए रखने में डॉ. मुखर्जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। बाद में उन्होंने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर भी संघर्ष किया और नजरबंदी के दौरान उनका निधन हुआ। प्रधानमंत्री ने कहा कि वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 और 35(A) का हटाया जाना उनके सपनों को सच्ची श्रद्धांजलि है।
शिक्षा सुधारों के अग्रदूत थे डॉ. मुखर्जी
लेख में प्रधानमंत्री ने बताया कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने और उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में कई दूरगामी सुधार किए। उन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान, कृषि शिक्षा, पुस्तकालयों के विकास, शिक्षक प्रशिक्षण, खेलकूद और छात्र कल्याण जैसे क्षेत्रों को नई दिशा दी।
औद्योगिक भारत की मजबूत नींव रखी
प्रधानमंत्री ने कहा कि स्वतंत्र भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में डॉ. मुखर्जी ने दामोदर वैली कॉरपोरेशन, सिंदरी उर्वरक संयंत्र और औद्योगिक विकास जैसी ऐतिहासिक परियोजनाओं की शुरुआत की। उन्होंने पारंपरिक उद्योगों, हथकरघा, कुटीर उद्योग और श्रमिकों के हितों को भी समान महत्व दिया।
पीएम मोदी ने सिंदरी उर्वरक संयंत्र के पुनरुद्धार का उल्लेख करते हुए इसे अपने सार्वजनिक जीवन के सबसे यादगार क्षणों में से एक बताया।
लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्षधर
प्रधानमंत्री ने अपने लेख में कहा कि डॉ. मुखर्जी लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि मानते हुए काम किया, लेकिन जब वैचारिक मतभेद बढ़े तो उन्होंने गरिमापूर्ण ढंग से इस्तीफा देकर अलग राजनीतिक रास्ता चुना।
उन्होंने प्रथम संविधान संशोधन और बाद में लगाए गए आपातकाल का उल्लेख करते हुए कहा कि डॉ. मुखर्जी ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए लगातार आवाज उठाई थी।
मानवीय सेवा को बताया जीवन का आधार
प्रधानमंत्री ने 1943 के बंगाल अकाल और 1942 के मेदिनीपुर चक्रवात के दौरान डॉ. मुखर्जी की राहत एवं सेवा कार्यों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि संकट के समय पीड़ितों की सहायता के लिए उन्होंने राहत केंद्र और भोजनालय शुरू कराए तथा ब्रिटिश शासन की उदासीनता का भी खुलकर विरोध किया।
युवाओं से विकसित भारत के निर्माण का आह्वान
लेख के अंत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने युवाओं से डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के आदर्शों से प्रेरणा लेकर विकसित भारत के निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि देशवासी एक सशक्त, आत्मनिर्भर, संवेदनशील और एकजुट भारत के निर्माण के लिए निरंतर प्रयास करें।



