इस्लाम धर्म अपनाने के बाद नहीं मिलेगा एट्रोसिटी एक्ट का लाभ, बॉम्बे हाई कोर्ट का अहम फैसला

मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट की कोल्हापुर पीठ ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से इस्लाम धर्म अपना चुका है और उसी धर्म का पालन कर रहा है, तो उसके मामले में एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रावधान लागू नहीं होंगे।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इसका अर्थ यह नहीं है कि मामले में दर्ज अन्य आपराधिक आरोप स्वतः समाप्त हो जाएंगे। यदि भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत प्रथम दृष्टया अपराध बनता है, तो उसकी सुनवाई जारी रहेगी।
क्या है पूरा मामला?
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति वृषाली वी. जोशी की एकल पीठ ने की। शिकायतकर्ता महिला मूल रूप से हिंदू महार समुदाय से थी। वर्ष 2011 में उसने एक मुस्लिम युवक से विवाह किया था।
अदालत के समक्ष महिला ने स्वीकार किया कि विवाह के समय उसने इस्लाम धर्म अपना लिया था, अपना नाम भी बदल लिया था और तब से वह मुस्लिम धर्म का पालन कर रही है।
आरोपी पक्ष ने क्या दलील दी?
आरोपी पक्ष ने अदालत में कहा कि दोनों पक्ष एक ही परिवार से जुड़े हैं और उनके बीच विवाद पूरी तरह संपत्ति से संबंधित सिविल विवाद है।
उनका तर्क था कि संपत्ति विवाद में अदालत द्वारा यथास्थिति (Status Quo) का आदेश दिए जाने के बाद शिकायतकर्ता ने झूठी एफआईआर दर्ज कराई और इस मामले में एससी/एसटी एक्ट के तहत कोई अपराध नहीं बनता।
सरकारी पक्ष ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान अतिरिक्त लोक अभियोजक एस.वी. गवंड ने भी सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यदि शिकायतकर्ता इस्लाम धर्म अपना चुकी है और उसी का पालन कर रही है, तो उसके मामले में एससी/एसटी एक्ट के प्रावधान लागू नहीं हो सकते, भले ही धर्म परिवर्तन से पहले वह अनुसूचित जाति से संबंधित रही हो।
हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इससे भारतीय दंड संहिता के तहत दर्ज अन्य आरोप स्वतः समाप्त नहीं होते।
हाई कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?
बॉम्बे हाई कोर्ट ने आरोपी दंपति के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत लगाए गए आरोपों को निरस्त कर दिया। वहीं, अदालत ने माना कि एफआईआर में भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत लगाए गए अन्य आरोपों पर प्रथम दृष्टया सुनवाई योग्य सामग्री मौजूद है। इसलिए उन आरोपों के संबंध में मुकदमे की प्रक्रिया जारी रहेगी।
महत्वपूर्ण: यह फैसला इस मामले के विशेष तथ्यों और परिस्थितियों पर आधारित है। इसका अर्थ यह नहीं है कि धर्म परिवर्तन के हर मामले में स्वतः एससी/एसटी एक्ट लागू नहीं होगा। ऐसे मामलों में प्रत्येक प्रकरण का निर्णय उसके तथ्यों, लागू कानून और न्यायालय की व्याख्या के आधार पर किया जाता है।



